‘इजहार’

सुनो प्रिय,
अहसासों की अपनी अलग भाषा होती है, ये शब्दों के मोहताज नहीं होते! फिर भी अगर कोई कुछ लिखता है तो क्यों लिखता है?...ये मेरी समझ से परे है...शायद इसीलिए मैं नहीं जानता कि मैं क्यों लिख रहा हूं!



'प्यार करना आना', 'प्यार जताना आना' से ज्यादा जरूरी है। 
या वाकई ये जरूरी है कि किसी को जताना आए?


अगर ऐसा है तो तुम्ही बताओ मुझे किस कला में पारंगत होना चाहिए था? कितना अच्छा होता कि कोई बाँस मेरे होठों से लगकर तुम्हारी मन की धुन में बजता और मुझे कान्हा बना जाता....या कुछ तुलिकाओं की दोस्ती मेरी अंगुलियों से भी होती तो मैं तुम्हें दिखा पाता कि दुनिया में हम सहित आठ रंग हैं।


प्रेम एक थोड़ा सामाजिक लेकिन अधिक व्यक्तिगत व्यवहार है...इसमें लेन-देन तो नहीं होता फिर भी स्वीकरोक्ति या संतुष्ठि के रूप में प्राप्ति तो होती ही है। लेकिन...मैं कैसे कह दूं कि यह विवाह में होता है?...कारण कि किसी सभ्य गली की खूबसूरत दुमंजिला इमारत की बालकनी से निहारती और भी खुबसूरत दो आंखें जब सडक़ के उस पार कनखियों से झाँकती नजरों से मिल कर चार होती हैं तो किसी प्रत्यक्षदर्शी राहगीर की बरबस ही निकली मुस्कान इंसानी शादियों का मखौल तो उड़ाती ही होगी!...उन गलियों में से राहगीर बस गुजरते ही तो थे!...केवल प्रेमी वहां मंडराते थे और गलियों की पीड़ा ये रही कि वो जीवनभर घर पहुंचने का जरिया ही बनी रहने को अभिशप्त थी...कभी घर नहीं बन पाई...घरों के प्रति गलियों की इसी ईष्र्या के कारण...या घर बसने के बाद प्रेमी गलियों में मंडराना छोड़ देंगे इस डर के कारण... या शायद गलियों नें कभी ये राज आशिकों को उन्हें आबाद रखने के लिए दिए नजराने के तौर पर बताया हो और तभी से विवाह प्रेमियों के जीवन का एक आवश्यक संस्कार नहीं रह गया था।


खैर! ये प्रेम भी किसी मरणैषणा से कम भी नहीं, जो हर पल प्रेमियों के गले में बांहें डाले खुद भी आवारा बनी फिरती है,


'मरणैषणा' जो किसी पोखर की तलहटी में सुस्ताती शर्मीली 'काई' की तरह होती है...जो तभी नजर आती है जब पोखर सूखने के कगार पर हो...ना जाने क्यों अब इजहार की इच्छा आकार ले रही है...शायद मेरे शब्द मेरे प्रेम पोखर की आखिरी बूंदें बनने पर उतारू है। अब इससे ज्यादा खुलकर क्या कहूँ?


कला चाहे जिस रूप में संवर कर आ जाए...प्रेम को पूर्णत: अभिव्यक्त करने में अक्षम है...क्योंकि प्रेम स्वयं एक कला है..., अभिव्यक्ति है...मरणैषणा है जो जीजिविषा की पूरक है।


अब तुम्हीं बताओ मैं इसका इजहार कैसे करूं? 
...बोलकर छुपाऊं...या चुप रहकर जताऊं?


की इन पंक्तियों को मैं नहीं झुठला सकता...इसलिए मैं चुप रहूंगा, और इस तरह चुप रहकर उस प्रेम को ज्यादा जताऊंगा जो अभिव्यक्त करके जताया जा सकता था।